
नानी माँ के घर कि चारपाई नही बदली थी। ह्रषिकेश मे नई इमारतें बनी थीं पर इतनी नही कि उसे किसी शहर के जिस्म पर एक उंगली कि तरह ट्रांसप्लांट कर दे। देहरादून रोड को आज भी उन गिनी हुई 51 दुकानों ने ही मिलकर बनाया है और बाकी दुकानों के बीच से खुर्ची हुई गलियां आज भी अचानक गंगा जी की ओर ले जाती हैं। मामा जी ने पुरानी एन्फ़ील्ड बेच कर नई खरीद ली। पहाड़ों ने अपनी हदें कसी हुई थी और फ़िसलन ने अपने रास्ते। इंसान कि गलती न पहले थी और न अब।
देहरादून के घंटाघर के पास कुमार स्वीट शाप के सामने एक मुस्कान मिली थी सो उसे भी वहीं पाया। मसूरी मे रस्किन और उनके पहाड़ मिले और लम्बे रास्तों पर पाइन्स कि चुप्पी। मै भी वहीं था, मै भी वही था।

2 comments:
You werent there when i checked...just like a ghost of Ruskin Bond's story...
Ruskin is a name of great short stories for school books. I can't forget him. He is still amazing.
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