किस्सों के किस्से…

Saturday, August 02, 2008

In the lift


लिफ़्ट मे खड़े मै कांच से बाहर देख रहा था। बरसात होते हुए अब चार दिन हो गये थे। कांच पर बारिश की नसें तन गई थीं। चांद वहीं था और सूरज ने आना छोड़ दिया था, सो गल गया। अंधेरा था वहां। मेरा इंतज़ार था उसे।
लोहे के उस डिब्बे से मैने सारा मंज़र नापा और अगली मंज़िल पर उतर गया।

1 comments:

seema gupta said...

"what a thought and imagination great"