
लिफ़्ट मे खड़े मै कांच से बाहर देख रहा था। बरसात होते हुए अब चार दिन हो गये थे। कांच पर बारिश की नसें तन गई थीं। चांद वहीं था और सूरज ने आना छोड़ दिया था, सो गल गया। अंधेरा था वहां। मेरा इंतज़ार था उसे।
लोहे के उस डिब्बे से मैने सारा मंज़र नापा और अगली मंज़िल पर उतर गया।

1 comments:
"what a thought and imagination great"
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