आज मौसम बहुत अच्छा है। बिलकुल छुट्टियों सा। घर कि खिड़की से धूप मे पुते मैदान का नज़ारा, खेतों के बीच से चलती बस से देखने जैसा है। टीवी पर 'पुराना मंदिर' आ रही है। एक वक्त था, जब मैने इस फिल्म को मामा के घर, ‘ह्रषिकेश’ मे देखा था। स्कूल कि छुट्टियां शुरु हुए काफी समय हो गया था। और फिर मै भूल गया था कि ये छुट्टियाँ थीं। कोई काम न सूझता था। रात को ऐसी ही डरावनी फिल्में देखने के बाद छत पर रखी चारपाई पर मै चादर ओड़ कर लेट जाता था। हवांए पहाड़ों से फिसलकर गंगा मे गोते खाते हुए आया करती थी। पहाड़ों पर तने जगल रात को भी मौजूद थे पर नीली रौशनी मे बस पहाड़ के सिरे दिखते थे।
जंगल कि आग को मै अपनी उंगली पर नाप सकता था। चाँद कि रौशनी मे छत कि दिवार पर तेज़ तैरते साये दिखते थे। वो घर के पीछे कि खाली ज़मीन से आए चमगादड थे। अजीब खामोशी होती थी तब। और फिर दिमाग के पर्दे पर वो सब दिखता था जो नही था। ये यकीन होने लगता था कि रुहें होतीं हैं और ये कि मै जैसे उन्हीं से घिरा हूं। यकीन काफ़ी मज़बूत था।
वो वक्त था ‘यकीन’ करने का सो किया। अब वक्त नहीं है सो वो ‘यकीन’ भी जाता रहा।
किस्सों के किस्से…
Wednesday, August 05, 2009
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5 comments:
waah !
aisa hi hota hai
समय समय की बात है.
सही कहा।
रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!
ye sab kuch kaisa yaad sa lagta hai...kitni aam aur maamooli se tajurbe hua karte the..shayad hamari umr aur guzarte hue vakht ne inhe bevajah khaas bana diya hai...
vo tairte hue saaye..jaise aaj bhi ankhon ke saamne se jhalak ban kar guzar jaate hain..mere khayal se jagahein itni tang ho chuki hain..ki vo parchaiyan dekhen bhi arsa ho gaya hai..ya fir shaayad ek anjaan ki tarah bin dekhen unhe aagen nikal jaaya karta hun..apni hi udhed bun mein...
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