Wednesday, April 29, 2009

उसके 'ख्याल' को बहुत सम्भाल के रखा था न जाने कब से... और ये भी न कहुंगा के उसके लौट आने कि आस मे वो पल रहा था। पर अब न जाने कहाँ खो गया है वो। बड़ी शर्म-ओ-सारी महसूस करता हुं अपने माज़ी के कोरे पन्ने जब खुल जाते हैं बेमौके, बेवजह। तेरे आने का ख्याल आता भी है तो साथ स्याही नहीं लाता। पर अब शर्म भी न आएगी; हमारी बेवकूफी का कोई हिसाब ही नही रखा हमने।

Sunday, January 18, 2009

उखड़ता अीत

कल रात कुलदीप अंकल का देहांत हो गया। कुछ चार घंटे पहले मैने मिन्चु से बात की थी और वो दिल्ली से आए एक दवाईयों के पार्सल को लेने जा रहा था। पेट का कैंसर था ये बहुत देर मे पता चल पाया। मेरे कान पहले से ही सुन्न हैं, बस एक सी ही आवाज़ है जो फ़ैल गई है इन मे। न स्तब्ध और न ही किसी दुख का बोध है मुझे।

उन्हें ग़ुलाम अली कि ग़ज़लें बहुत पसंद थीं और अक्सर उनके साथ आलापों को सुनते पूरी रात लंघ जाया करती थी। बैंक आफ पंजाब से चार बजे तक छुट्टी लेकर वो घर आ जाया करते थे, फिर नहा कर, थोड़ी परफ्यूम लगाकर, अल्मारी मे ताकते थे, अपने कलैक्शन कि तरफ।

ऐसा नही है कि 'एहसास', पूरी तरह ही कहीं खो गया है। बचपन मे सुनीता बुआ कि जलंधर वाली कोठी से 3 रु वाले साईकिल रिक्शा से मखदूमपुरा कि गली मे मै, मम्मा और सोनी विमल बुआ, मिन्चु, काके और अंकल से मिलने आया करते थे। बचपन मे रास्ता न भूल जाएं, इसलिए घर के पास मे मौजूद एक पीली कचरा पेटी को याद रखता था मै। उनके साथ माडल टाउन मे कभी किी रेकार्ड ी दुकान, कभी किसी चाट ी दुकान और कभी उनके स्कूटर पर मौहल्ले का चक्कर ही लगा लिया करता था। यह सब मुझे याद है। कभी-कभी महसूस होता है कि मेरे बचपन के या्दों के सारे मील के पत्थर अब उखड़ने लगे हैं। अंकल, आप मुझे हमेशां याद आओगे।

Tuesday, August 19, 2008

एक त्रिवेणी, गुलज़ार के लिये


सारे कमरे रेत से भर गए,
एक हला ही था सो वो भी न रहा।

दिल कि आवाज़ अब ज़हन तक नही जाती।

Saturday, August 02, 2008

मै भी वही था…


नानी माँ के घर कि चारपाई नही बदली थी। ह्रषिकेश मे नई इमारतें बनी थीं पर इतनी नही कि उसे किसी शहर के जिस्म पर एक उंगली कि तरह ट्रांसप्लांट कर दे। देहरादून रोड को आज भी उन गिनी हुई 51 दुकानों ने ही मिलकर बनाया है और बाकी दुकानों के बीच से खुर्ची हुई गलियां आज भी अचानक गंगा जी की ओर ले जाती हैं। मामा जी ने पुरानी एन्फ़ील्ड बेच कर नई खरीद ली। पहाड़ों ने अपनी हदें कसी हुई थी और फ़िसलन ने अपने रास्ते। इंसान कि गलती न पहले थी और न अब।

देहरादून के घंटाघर के पास कुमार स्वीट शाप के सामने एक मुस्कान मिली थी सो उसे भी वहीं पाया। मसूरी मे रस्किन और उनके पहाड़ मिले और लम्बे रास्तों पर पाइन्स कि चुप्पी। मै भी वहीं था, मै भी वही था।

In the lift


लिफ़्ट मे खड़े मै कांच से बाहर देख रहा था। बरसात होते हुए अब चार दिन हो गये थे। कांच पर बारिश की नसें तन गई थीं। चांद वहीं था और सूरज ने आना छोड़ दिया था, सो गल गया। अंधेरा था वहां। मेरा इंतज़ार था उसे।
लोहे के उस डिब्बे से मैने सारा मंज़र नापा और अगली मंज़िल पर उतर गया।

Wednesday, July 04, 2007

And they lived happily ever after!

शादी क्या सब कर सकते हैं? अब ये भी कोई सवाल है? मुझे लगता है कि है। आज तुम्हे कविता लिखना अच्छा लगता है। कितनी ही बार तुम रातों को उठे और नींद मे तली, हाथों से छानी नज़्मों को तुमने डायरी पर परोस दिया। और कितनी बार तुमने पहाड़ों से बात करनी चाही और जब मिले तो तुम्हारे आपस कि घंटों कि गुफ़्तगुं किसके हलक से नीचे उतरी, क्या कभी सवाल भी रहा? कभी लगा है कि दुनिया के सारे किस्से जिनमे एक जोड़ी हमेशा एक दूसरे के साथ रहने को तैयार है, एक शादीशुदा इंसान कि ही सोच हो सकती है? अगर कोई ये कहे कि तुम पागल हो, ज़िन्दगी को फिक्शन कि तरह लेते हो।
क्या कभी सोचा है कि जब तुम्हे इसी फिक्शन पर विशवास हो चले, उसे न हो? और फिर क्या तुम किसी और के साथ वो ही ख़्वाब देख सकोगे? मैने शायद फिर पागलपन का सबूत दिया। ये भी तो फिक्शन जैसा ही लगता है। कितनी अजीब बात है कि वो सब किस्से कहानियां जिन्हे आप बचपन से सुनते आ रहें है एक मज़ाक था। कहीं उसमे भी समाज का सभी के द्वारा माना हुआ अंत निर्धारित किया जाता रहा। हमारे ख़्वाब इन्ही इंटों से ही तो बने होंगे? और अगर ये सच है तो क्या इस मकान मे ज़िन्दगी बिताने का फैसला आपने कर लिया है? क्या इस बात पर मुबारकबाद लेना पसंद करेंगे? वजह नही मिल रही न?

Wednesday, June 27, 2007

पहलवानी के फायदे

पहलवान जब कसरत करता है तो दिमाग को आराम करने के लिए छोड़ देता है। यह सब जानते हैं और फ़िर चुटकियाँ भी लेते हैं। पर मै इस तर्क से न ही सिर्फ़ पूरी तरह सहमत हूं, बल्कि इसे अपना भी चुका हूं। पूरे दिन कि थकान और दिमागी पहलवानी दिखाने के बाद अगर कुछ है जिसे करते हुए मेरा मन लगा रहता है तो वह है जिम्मिंग।
खाने पीने से लेकर और भी इतना कुछ है जो कि ठीक करना है, और कसरत का असर शायद उस सफाई अभियान का वो हिस्सा है जो नज़र आता है। जिम मे बहुतों को देखा जा सकता है अपने आप को निहारते हुए। एक एसी ज़िन्दगी मे वैसे भी क्या रखा है जहां आप अपने आप को कहीं भूल ही गए हों और जब पाएं तो यकीन करने पर भी विश्वास नही होगा कि ये मै ही हूं।

Monday, March 12, 2007

आखिर अच्छा लिखने के लिए क्या ज़रुरी है?

एक ज़बरदस्त 'किस्सा' जो आप बाँट सकें? एक बेहतरीन लिखने का तरीका? अक्स सा ही बन जाए अगर आपका लिखा तो क्या मकसद पूरा हो जाता है? क्या ढ़ेर सारी किताबें पढ़ने से जो शब्द्कोश है वो भरेगा, ख्याल में होंगी न सोचे जाने वाली बातें? और फ़िर सवाल ये भी तो है कि मै लिखूं ही क्युं?
ज़रुरत है रुह कि, ज़रुरत है दिमागी छल्लों को सीधा करने कि, ज़रुरत है जीने कि एक बार फ़िर वो सब जो आप जी चुके है। तो जनाब, खोज लीजिए अपनी ज़रुरत, अच्छा तो तभी लिखा जाएगा।

आप ही बताइए!

इस ब्लाग पर लिखने से पहले मुझे उन बातों के बारे मे सोचना पढ़ता है जिनके बारे मे मै लिख सकता हुं पर नही लिखनी है। और फ़िर मै इसे अब भी इसकी रुह नही दे पाया। जो अब तक लिखा है, वो तो बस फ़ूल हैं, मंत्र हैं, विनती है अपने आप से कि इसे एक साकार रुप दे सकूँ। आप अगर मुझे जानते हैं (या फ़िर मेरे किस्सेकारी के ज़रिए ही मुखातिब हुए हों) तो मुझे बताइए कि मै कैसे इन पन्नों कि रुह अदाइगी कर सकूँ ?