ख़त लिखा उसे, पर ख़त को पता न मिला,
मै रात कि चादर भे लिपटे अपनी तक़दीर ही से मिलने को तरसता रहा...
www.राइटर.co.in
किस्सों के किस्से…
Tuesday, August 16, 2011
Tuesday, September 29, 2009
Wednesday, August 05, 2009
यकीन
आज मौसम बहुत अच्छा है। बिलकुल छुट्टियों सा। घर कि खिड़की से धूप मे पुते मैदान का नज़ारा, खेतों के बीच से चलती बस से देखने जैसा है। टीवी पर 'पुराना मंदिर' आ रही है। एक वक्त था, जब मैने इस फिल्म को मामा के घर, ‘ह्रषिकेश’ मे देखा था। स्कूल कि छुट्टियां शुरु हुए काफी समय हो गया था। और फिर मै भूल गया था कि ये छुट्टियाँ थीं। कोई काम न सूझता था। रात को ऐसी ही डरावनी फिल्में देखने के बाद छत पर रखी चारपाई पर मै चादर ओड़ कर लेट जाता था। हवांए पहाड़ों से फिसलकर गंगा मे गोते खाते हुए आया करती थी। पहाड़ों पर तने जगल रात को भी मौजूद थे पर नीली रौशनी मे बस पहाड़ के सिरे दिखते थे।
जंगल कि आग को मै अपनी उंगली पर नाप सकता था। चाँद कि रौशनी मे छत कि दिवार पर तेज़ तैरते साये दिखते थे। वो घर के पीछे कि खाली ज़मीन से आए चमगादड थे। अजीब खामोशी होती थी तब। और फिर दिमाग के पर्दे पर वो सब दिखता था जो नही था। ये यकीन होने लगता था कि रुहें होतीं हैं और ये कि मै जैसे उन्हीं से घिरा हूं। यकीन काफ़ी मज़बूत था।
वो वक्त था ‘यकीन’ करने का सो किया। अब वक्त नहीं है सो वो ‘यकीन’ भी जाता रहा।
जंगल कि आग को मै अपनी उंगली पर नाप सकता था। चाँद कि रौशनी मे छत कि दिवार पर तेज़ तैरते साये दिखते थे। वो घर के पीछे कि खाली ज़मीन से आए चमगादड थे। अजीब खामोशी होती थी तब। और फिर दिमाग के पर्दे पर वो सब दिखता था जो नही था। ये यकीन होने लगता था कि रुहें होतीं हैं और ये कि मै जैसे उन्हीं से घिरा हूं। यकीन काफ़ी मज़बूत था।
वो वक्त था ‘यकीन’ करने का सो किया। अब वक्त नहीं है सो वो ‘यकीन’ भी जाता रहा।
Tuesday, August 04, 2009
जंगल कि ख़ामोशी मे तो युं भी शर्म आएगी।
‘हवा’ मेरे दफ्तर कि पार्किंग मे नमाज़ पढ़ती है और किसी को ख़बर भी नही है। उसके पास घुटने टिकाने के लिए अब जगह जो नही है। इमारतें खड़ीं है अब हर ज़र्रे पर। ज़माना या सड़क पर है या छतों कि नीचे। कभी – कभी सोचता हूं कि ज़िन्दगी अगर महज़ सौदेबाज़ी है तो क्युं पड़े कोई कविता या संगीत के बहकावे मे? और वैसे भी कितना खूबसूरत शोर है यहां कि अब मै सड़क पर जितना चिल्लाना चाहूं चिल्ला सकता हूं…सब कहने वाले हैं, सुनने वाला कोई नही। जंगल कि ख़ामोशी मे तो युं भी शर्म आएगी।
Sunday, January 18, 2009
उखड़ता अीत
कल रात कुलदीप अंकल का देहांत हो गया। कुछ चार घंटे पहले मैने मिन्चु से बात की थी और वो दिल्ली से आए एक दवाईयों के पार्सल को लेने जा रहा था। पेट का कैंसर था ये बहुत देर मे पता चल पाया। मेरे कान पहले से ही सुन्न हैं, बस एक सी ही आवाज़ है जो फ़ैल गई है इन मे। न स्तब्ध और न ही किसी दुख का बोध है मुझे।
उन्हें ग़ुलाम अली कि ग़ज़लें बहुत पसंद थीं और अक्सर उनके साथ आलापों को सुनते पूरी रात लंघ जाया करती थी। बैंक आफ पंजाब से चार बजे तक छुट्टी लेकर वो घर आ जाया करते थे, फिर नहा कर, थोड़ी परफ्यूम लगाकर, अल्मारी मे ताकते थे, अपने कलैक्शन कि तरफ।
ऐसा नही है कि 'एहसास', पूरी तरह ही कहीं खो गया है। बचपन मे सुनीता बुआ कि जलंधर वाली कोठी से 3 रु वाले साईकिल रिक्शा से मखदूमपुरा कि गली मे मै, मम्मा और सोनी विमल बुआ, मिन्चु, काके और अंकल से मिलने आया करते थे। बचपन मे रास्ता न भूल जाएं, इसलिए घर के पास मे मौजूद एक पीली कचरा पेटी को याद रखता था मै। उनके साथ माडल टाउन मे कभी किी रेकार्ड ी दुकान, कभी किसी चाट ी दुकान और कभी उनके स्कूटर पर मौहल्ले का चक्कर ही लगा लिया करता था। यह सब मुझे याद है। कभी-कभी महसूस होता है कि मेरे बचपन के या्दों के सारे मील के पत्थर अब उखड़ने लगे हैं। अंकल, आप मुझे हमेशां याद आओगे।
उन्हें ग़ुलाम अली कि ग़ज़लें बहुत पसंद थीं और अक्सर उनके साथ आलापों को सुनते पूरी रात लंघ जाया करती थी। बैंक आफ पंजाब से चार बजे तक छुट्टी लेकर वो घर आ जाया करते थे, फिर नहा कर, थोड़ी परफ्यूम लगाकर, अल्मारी मे ताकते थे, अपने कलैक्शन कि तरफ।
ऐसा नही है कि 'एहसास', पूरी तरह ही कहीं खो गया है। बचपन मे सुनीता बुआ कि जलंधर वाली कोठी से 3 रु वाले साईकिल रिक्शा से मखदूमपुरा कि गली मे मै, मम्मा और सोनी विमल बुआ, मिन्चु, काके और अंकल से मिलने आया करते थे। बचपन मे रास्ता न भूल जाएं, इसलिए घर के पास मे मौजूद एक पीली कचरा पेटी को याद रखता था मै। उनके साथ माडल टाउन मे कभी किी रेकार्ड ी दुकान, कभी किसी चाट ी दुकान और कभी उनके स्कूटर पर मौहल्ले का चक्कर ही लगा लिया करता था। यह सब मुझे याद है। कभी-कभी महसूस होता है कि मेरे बचपन के या्दों के सारे मील के पत्थर अब उखड़ने लगे हैं। अंकल, आप मुझे हमेशां याद आओगे।
Tuesday, August 19, 2008
Saturday, August 02, 2008
मै भी वही था…

नानी माँ के घर कि चारपाई नही बदली थी। ह्रषिकेश मे नई इमारतें बनी थीं पर इतनी नही कि उसे किसी शहर के जिस्म पर एक उंगली कि तरह ट्रांसप्लांट कर दे। देहरादून रोड को आज भी उन गिनी हुई 51 दुकानों ने ही मिलकर बनाया है और बाकी दुकानों के बीच से खुर्ची हुई गलियां आज भी अचानक गंगा जी की ओर ले जाती हैं। मामा जी ने पुरानी एन्फ़ील्ड बेच कर नई खरीद ली। पहाड़ों ने अपनी हदें कसी हुई थी और फ़िसलन ने अपने रास्ते। इंसान कि गलती न पहले थी और न अब।
देहरादून के घंटाघर के पास कुमार स्वीट शाप के सामने एक मुस्कान मिली थी सो उसे भी वहीं पाया। मसूरी मे रस्किन और उनके पहाड़ मिले और लम्बे रास्तों पर पाइन्स कि चुप्पी। मै भी वहीं था, मै भी वही था।
In the lift
Subscribe to:
Posts (Atom)


