कल रात कुलदीप अंकल का देहांत हो गया। कुछ चार घंटे पहले मैने मिन्चु से बात की थी और वो दिल्ली से आए एक दवाईयों के पार्सल को लेने जा रहा था। पेट का कैंसर था ये बहुत देर मे पता चल पाया। मेरे कान पहले से ही सुन्न हैं, बस एक सी ही आवाज़ है जो फ़ैल गई है इन मे। न स्तब्ध और न ही किसी दुख का बोध है मुझे।
उन्हें ग़ुलाम अली कि ग़ज़लें बहुत पसंद थीं और अक्सर उनके साथ आलापों को सुनते पूरी रात लंघ जाया करती थी। बैंक आफ पंजाब से चार बजे तक छुट्टी लेकर वो घर आ जाया करते थे, फिर नहा कर, थोड़ी परफ्यूम लगाकर, अल्मारी मे ताकते थे, अपने कलैक्शन कि तरफ।
ऐसा नही है कि 'एहसास', पूरी तरह ही कहीं खो गया है। बचपन मे सुनीता बुआ कि जलंधर वाली कोठी से 3 रु वाले साईकिल रिक्शा से मखदूमपुरा कि गली मे मै, मम्मा और सोनी विमल बुआ, मिन्चु, काके और अंकल से मिलने आया करते थे। बचपन मे रास्ता न भूल जाएं, इसलिए घर के पास मे मौजूद एक पीली कचरा पेटी को याद रखता था मै। उनके साथ माडल टाउन मे कभी किी रेकार्ड ी दुकान, कभी किसी चाट ी दुकान और कभी उनके स्कूटर पर मौहल्ले का चक्कर ही लगा लिया करता था। यह सब मुझे याद है। कभी-कभी महसूस होता है कि मेरे बचपन के या्दों के सारे मील के पत्थर अब उखड़ने लगे हैं। अंकल, आप मुझे हमेशां याद आओगे।